अपने सोच को बदलिए, जिंदगी बदल जाएगी।

अपने सोच को बदलिए,जिंदगी बदल जाएगी।

एक राजकुमार से महात्मा बनने की कहानी 

Change The Mind, The World Will Change

   जिंदगी में हजारों युद्ध जीतने से अच्छा है कि आप स्वयं पर विजय प्राप्त कर लो। फिर जीत हमेंशा आपकी होगी, इसे आपसे कोई नहीं छीन सकता। जिंदगी में किसी लक्ष्य तक पहुंचने से ज्यादा महत्वपूर्ण, उस यात्रा को अच्छे से संपन्न  करना होता है।

         इस कहानी के माध्यम से आज हम ये समझने की कोशिश करेंगे कि कैसे अपने विचार में एक बदलाव लाने से पूरा जीवन बदल जाता है। व्यक्ति का एक अच्छा फैसला जीवन में चार चांद लगा देता है, वहीं एक गलत फैसला पूरा जीवन बर्बाद कर देता है। आज हम बात करने जा रहे है महात्मा बुद्ध के बारे में की कैसे वह एक राजकुमार, युवराज से महात्मा, सन्यासी बन गए। इस कहानी को अंत तक पढ़िए, मुझे विश्वास है, कि इस कहानी से आप जरूर कुछ अच्छाई लेकर जायेंगे। 

महात्मा बुद्ध-

          इस महान पुरुष का जन्म 563 ई.पूर्व कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी (नेपाल) में हुआ था। इनके पिता राजा सुद्धोधन तथा माता का नाम महामाया देवी था। इनका नाम सिद्धार्थ रखा गया। 
    सिद्धार्थ के जन्म के पश्चात् उनके पिता राजा सूद्धोधन ने नामकरण समारोह रखा। और आठ ब्राह्मण विद्वानों को सिद्धार्थ का भविष्य देखने के लिए आमंत्रित किया। किसी ब्राह्मण ने बोला कि महान राजा बनेगा, किसी ने कहा पथ प्रदर्शक बनेगा, तो किसी ने बोला सन्यासी हो जाएगा। उसी में एक बारह वर्ष का ब्राह्मण पंडित लड़के ने बोला मै यकीन से कहता हूं कि ये सन्यासी हो जाएगा। 

          अब राजा सूद्धोधन ये सुन कर  बहुत परेशान हुए की एक लड़का हुआ और ओ भी सन्यासी हो जाएगा । राजा ने उन पंडितो से पूछा कि ऐसा कोई उपाय बताओ कि ये सन्यासी न बने । पांडितो ने बताया कि इसके आप पास कोई भी ऐसी चीज नहीं दिखनी चाहिए जिससे इसे लगे की दुख, बुढ़ापा, मृत्यु, बीमारी इत्यादि इस दुनिया में होती है। ये सब चीजें इसे संन्यास लेने की तरफ आकर्षित करेंगी। 

युवराज से महात्मा बनने का सफर –
       राजा ने युराज सिद्धार्थ के भोग विलास का पूरा व्यवस्था कर दिया। तीनो मौसम के लिए तीन महल में अलग अलग व्यवस्था करा दिये। उनके लिए मनोरंजन, नाच – गाना की व्यवस्था की गई। माली बगीचे के पौधों को पिला नहीं होने देते, राजा ने वर्ष के बारह महीने बगीचों को हरा भरा रखने के आदेश दिए थे। सिद्धार्थ को यह पता नहीं चलता अब कि जीवन, मरण, बुढ़ापा, सुख दुःख इत्यादि क्या होता है। राजा के तरफ से ये सब उन्हें किसी को बताने के लिए मना किया गया था। समय बीतता गया। उनकी शादी यशोधरा नामक राजकुमारी से हुई। उनके एक पुत्र राहुल भी हुए। 

        अब वह समय आ गया जब पंडितो की कहीं हुई बात सच होनी थीं। कहा गया है कि भगवान ने जो किस्मत में लिख दिया उसे कोई बदल नहीं सकता। युवराज सिद्धार्थ को एक युवक महोत्सव में भाग लेने जाना था। उस युवक महोत्सव का उद्घाटन युवराज ही किया करते थे। अब चारो तरफ डिंडोरा पीटा दिया गया कि युवराज जहां से भी जायेंगे कोई भी बूढ़ा व्यक्ति नहीं दिखना चाहिए, पेड़ो पर पीले पत्ते नहीं दिखने चाहिए, कोई बीमार, कोई शव यात्रा नहीं दिखनी चाहिए। 

            अब सारथी युवराज को रथ पर बैठा कर युवक महोत्सव के लिए महल से निकल गया। महल से निकलने के बाद कुछ दूर जाने पर एक बूढ़ा व्यक्ति दिखा। युवराज ने बोला इसे क्या हुआ, ये झुक कर क्यों चल रहा है। सारथी ने बोला युवराज मुझे ये सब बताने कि इजाजत नहीं है। युवराज ने बोला बता नहीं तो मै आदेश दूंगा तेरा सर कलम कर दिया जाएगा। सारथी कहा ये बूढ़ा व्यक्ति है। युवराज पूछे, ये क्या होता है। सारथी बोला ये जवानी के बाद की अवस्था होती है। 

          फिर रथ को आगे बढ़ाया। कुछ दूर चलने के पश्चात् युवराज सिद्धार्थ ने देखा, कुछ लोग शव यात्रा लेकर जा रहे थे। सारथी से पूछा ये लोग आदमी को बांध कर कहा ले जा रहे है। सारथी बोला ये मर गया है। युवराज ने बोला ये क्या होता है। सारथी बोला ये बुढ़ापे के बाद की अवस्था होती है। युवराज ने पूछा क्या सभी मरते है, सारथी बोला जो आया है उसे मारना है। मतलब मै भी एक दिन मर जाऊंगा, सारथी बोला हां युवराज। सिद्धार्थ बोले रथ आगे बढ़ाओ। सारथी रथ को लेकर आगे बढ़ा। कुछ दूर चलने के बाद रास्ते में युवराज को एक व्यक्ति दिखा जो गेरुवा वस्त्र पहने कहीं जा रहा था। युवराज ने सारथी से पूछा कि ये कौन है, ऐसा क्यों पहन रखा है। सारथी ने जवाब दिया युवराज ये सन्यासी है, योगी है। ये घर परिवार, संसारिक सुख, भोग विलास छोड़ कर सन्यासी बन गया है।इसे संसार के सुख दुःख से अब कोई मतलब नहीं है। युवराज सिद्धार्थ ने कहा कि ऐसा भी होता है क्या? और रथ वापस ले लिया। 
सिद्धार्थ के विचारों में परिवर्तन –
                  मित्रो युवराज सिद्धार्थ युवक महोत्सव नहीं गए। सारथी से बोले रथ घुमाओ, वापस चलो महल। युवराज महल वापस आ गए। आने के पश्चात् उसी रोज रात में बिना बताए अपने पिता, पत्नी, बच्चे और भोग विलास को छोड़ कर सन्यासी बनने चले गए। समय बीतता गया, युवराज सिद्धार्थ बारह वर्ष के बाद बुद्ध बनकर वापस आए।  तेज उनके ललाट पर था। घर का दरवाजा खटखटाया। यशोधर उनकी पत्नी ने दरवाजा खोला, देखा सिद्धार्थ खड़ा है। यशोधरा गुस्से में बोली कि बता के नहीं जा सकते थे। इतने दिन हमारी कोई खबर तक नहीं ली तुमने। तो सिद्धार्थ ने बोला देखो यशोधरा गया कोई और था और लौट कर आया कोई और है। जो सिद्धार्थ गया था बारह वर्ष पहले आज वह महात्मा बुद्ध बनकर वापस आया है। 
    इस तरह एक विचार सिद्धार्थ को भगवान बुद्ध बना दिया । हमारी एक अच्छी सोच हमारी जिंदगी बदल सकती है। हमें किसी और को बदलने की जरूरत नहीं है। हमें अपने विचार, अपने सोच को बदलने की आश्यकता है। अपने सोच को बदलिए, पूरी दुनिया बदल जाएगी। 
आपके लिए एक वाक्य –
वक्त के साथ बदलना सीखा है मैंने।
हालात कैसे भी हो मुस्कुराना सीखा है मैंने।।

 जय हिन्द, जय भारत!

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