Nawajuddin Siddhiki, Best Powerful Motivational Story In Hindi

Nawajuddin Siddhiki,  Best Powerful Motivational Story In Hindi

     दोस्तो, कहानियां तो हम बहुत पढ़ते सुनते हैं। पर सफल कहानी वहीं होती है जो हमारे जीवन में सफलता, बदलाव लाने का काम करें। कहानी पढ़ना सफल हो और साथ ने हम भी सफल व्यक्ति बने। प्रेरणा देने वाली कहानियां भी तरह तरह की होती है। कोई जीवन में सफलता की प्रेरणा देती हैं, तो कोई व्यापार, नौकरी आदि। आज आपको ऐसी एक अलग प्रेरणादायक कहानी पढ़ने के लिए मिलेगी जो आपको सभी क्षेत्र में सफल बनाने का कार्य करेगी। कहानी को अन्त तक पढ़िए। इस (Powerful Motivational Story In Hindi) कहानी से आपको बहुत कुछ सीखने के लिए मिलने वाला हैं –

आपके ज़िद के सामने झुकेगी दुनिया, झुकाने वाला चाहिए

                         
         नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का जन्म 19 मई 1974 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर नगर जिले एक गरीब मुस्लिम परिवार में हुआ था। नवाजुद्दीन की शुरू से एक फिल्म अभिनेता बनने की इच्छा थी। उनके परिवार से न कभी कोई फिल्म में था, न ही उनकी शक्ल, कद काठी फिल्म अभिनेता बनने लायक थी। लेकिन उनके पास जो एक चीज थी वह थी उनकी ज़िद। नवाजुद्दीन ने सोच लिया था कि बनना है अब तो फिल्म अभिनेता, चाहे कुछ भी हो जाए। नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने अपनी फिल्मी जीवन की शुरुवात 1999 में अमीर खान की फिल्म सरफरोश से एक छोटे से रोल से किया था। 
         नवाजुद्दीन सिद्दीकी की संघर्ष की कहानी 
  
 एक बार नवाज जब संघर्ष कर रहे थे, फिल्मों में काम करने के लिए तो वह एक दिन एक फिल्म निर्देशक के ऑफीस में जाकर खड़े थे। तभी एक फिल्म निर्देशक का सहायक आकर नवाज से पूछा कि क्या करने आए हो। नवाज ने बोला, अभिनेता बनने आए हैं। निर्देशक का सहायक बोला देखने से तो अभिनेता लगते नहीं हो। उस समय यह चलन थी कि एक्टर छः फिट लम्बा, गोरा, हष्ट पुष्ट होगा। और नवाज की पांच  फिर हाईट, सांवला रंग, देखने में दुबला पतला आदमी था। 

                       जब नवाज ने अपने रिश्तेदारों से इच्छा जहीर की, कि मै फिल्म अभिनेता बनना चाहता हूं। तो नवाज के रिश्तेदारों ने भी उसे हतोत्साहित किया। बोले पहले अपनी सकल तो देख ले। पांच फीट का काला कलूटा, दुबला पतला आदमी। तू कैसे अभिनेता बन सकता है। और सब नवाज के इस फैसले पर हसी उड़ा रहे थें। पर नवाज की एक ज़िद थी। कि एक्टर तो बनना है। चाहे कुछ भी हो जाए। 

         नवाज ने सोच लिया था कि फिल्म में लोगो की सोच है कि फिल्म अभिनेता तो छः फिट लम्बा, गोरा, और डोले सोले वाले ही होते है। अब नवाज सोचने लगा कि ऐसा क्या करें, कि दुनिया को सबसे अलग लगे, और सब पसंद करें। नवाज ने National School Of Drama Delhi में तीन साल की ट्रेनिंग ली। 
        नवाज ट्रेनिंग के बाद भी किसी निर्देशक, निर्माता के ऑफिस जाता था, तो भी उसे यही सुनने को मिलता था कि अपना कद काठी, हुलिया, सकल तो देख। बार बार ये नवाज को सुनने के लिए मिलता था। क्योंकि इससे पहले ऐसे व्यक्तित्व का कोई बॉलीवुड में अभिनेता बना ही नहीं था। लेकिन नवाज को अपनी ट्रेनिंग और मेहनत पर पूरा भरोसा था कि एक दिन न एक दिन मेरा नंबर जरूर आयेगा। और मैं फ़िल्म अभिनेता बनूंगा। नवाज ने कभी ये नहीं सोचा कि दो चार साल प्रयास करता हूं, अभिनेता बना तो ठीक है। नहीं तो कोई दूसरा फील्ड अपना लूंगा। नवाज की ज़िद थी कि अभिनेता बनना है, भले ही दस या बीस साल लगें।
         
      किसी काम का आपको जज्बा हो। किसी चीज को दिल से पाने की आपकी ज़िद हो, तो पूरी कायनात लग जाती है आपकी ज़िद को पूरा करने के लिए। बस आपको ज़िद्दी होना पड़ता है। इन सब के लिए आपको बहुत कुछ अपने आप से समझौता   करना पड़ता है। कहते हैं, कि जितनी बड़ी कामयाबी, उतनी बड़ी परीक्षा होती है। कभी भी लक्ष्य बड़ा चुनिए। क्योंकि लक्ष्य बड़ा होगा तो कामयाबी भी बड़ी मिलेगी। 
           
            नवाज में एक और खासियत थी कि वह असफल होने से नहीं डरता था। क्योंकि सफल होने के लिए असफल होना जरूरी होता है। और इस असफल प्रयास से हम बहुत कुछ सिखतें है। जैसे एडिशन भी बल्ब बनाने से पहले सौ बार असफल हुए। बल्ब बन गया और सफल हुए तब उन्होंने ये भी जाना कि इस निनानवे फॉर्मूलों से बल्ब नहीं बन सकता। इसके लिए बस एक ही फॉर्मूला होता है। 
 
                  नवाज सन् 1999 से छोटे छोटे दस मिनट पांच मिनट का रोल करने लगा। साल में एक रोल मिलता और पूरे साल ऐसे ही बीत जाते थे। नवाज ने अपनें प्रयास को जारी रखा। मौका तलाशता रहा कि कब कोई बड़ा किरदार मिले। जिससे अपनी प्रतिभा, अपनी ट्रेनिंग को दुनिया को दिखा सकें। नवाज लोगो के बीच रह कर लोगो को Observe किया करता था। यही उसके सफल होने का कारण बन गया। नवाज ने अपने फिल्मों के लिए इन्हीं Observe किए हुए पात्र को अपने अभिनय के लिए चुना। जिसने उसे सफल बनाने में मदद किया। 
               नवाज को बारह वर्ष तक छोटे छोटे दस पांच मिनट के रोल मिलता रहा। जिससे नवाज को कोई कामयाबी नहीं मिली। नवाज की मां नवाज को पत्र लिखा करती थी। और सभी पात्र के अन्त में एक लाइन लिखती थी कि बारह वर्ष में तो कचरे का दिन अजाता है। तो तुम्हारा भी जरूर आएगा। नवाज अपनी मां के इस लाइन को अपने जीवन का आदर्श बनाया। अब वह दिन आया जब नवाज कि ज़िद पूरी होनी थी। सन् 2012 में नवाज को दो फिल्मों में मुख्य किरदार में एक अभिनेता के रूप में काम करने का मौका मिला। फिल्म का नाम गैंग्स ऑफ बासेपुर और गैंग्स ऑफ बासेपुर-2 था। इस फिल्म ने नवाज कि जिन्दगी बदल कर रख दिया। नवाज को दुनिया बतौर अभिनेता जानने लगी। इसके बाद उन्हें फिल्में मिलने लगी। जिसमे वह मुख्य किरदार और सहायक किरदार में एक बतौर अभिनेता काम करते नजर आने लगें। आज नवाजुद्दीन सिद्दीकी एक लोकप्रिय अभिनेता है। दुनिया उनकी अभिनय कि सराहना करती है। नवाज जिस उचाई पर खड़े हैं, उनकी मेहनत, ज़िद और सब्र का फल है। 
निष्कर्ष
                         इस तरह हमें इस कहानी से सीखने के लिए मिलता है कि हम में अपने लक्ष्य को पाने के लिए किस तरह की लगन और ज़िद होनी चाहिए। कैसे अपने बड़े कामयाबी के लिए बड़े चुनौतियों का सामना करना चाहिए। कामयाबी पाने  के लिए धैर्य का होना आवश्यक है। सफल होने में समय लग सकता है, पर सफलता जरूर मिलेगी। अपने काम को पूरी ईमानदारी से करते रहना चाहिए।असफल होने से परेशान कभी मत हो, क्योंकि हर सफल व्यक्ति पहले असफल होता है।  
आपके लिए एक वाक्य –

 कि  ‘खुदी को कर बुलंद इतना
 कि  खुदा, खुद बंदे से पूछे
 कि बता तेरी रजा क्या है’।
 

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